मिथिलामे एहि व्रतक नाम शुद्ध नाम हरिताली थिक।

भाद्रपद शुक्ल तृतीया केँ प्रातःओष कालमे सदा सुहागिन रहबाक कएहि दिन स्त्रियाँ हरितालिका व्रत करैत छथि।थि। भिनसारे थोड़ेक काल जँ तृतीया अछि आ तकर बाद चतुर्थी भए जाइत अछि।तखनहुँ ओहि दिन व्रत कएल जाइत अछि। साँझमे जँ चौठ पड़ि जाइत अछि तँ कोनो बात नञि।

प्राचीनकालमे भाद्र शुक्ल चतुर्थीकें “हर्याली” नामक व्रतक विधान चण्डेश्वर अपन कृत्यरत्नाकरमे कएने छथव्रत हो। असंभव नै जे ओहे “हर्याली” हो। व्रत आइ उदयगामिनी तृतीयाके हरितालिका नामक व्रतक रूपमे प्रचलनमे आबि गेल अछि। तेँ चतुर्थी तिथिक योगसँ कोनओ क्षति नै। मुदा प्रातःकालमे यदि द्वितीरहे आ भरि दिन-राति तृतीया रहए तँ ओहि दिन वव्रत नहि होयत।

हरितालीव्रतक पूजापद्धति जे वर्षकृत्यमे देल गेल अछि। ताहिमे चौदह वर्षक लेल संकल्पप करबाक विधान सेहो कएल गेल अछि। ई संकल्प आब प्रचलनसँ उठि गेल अछि।ल अछि। यद्यपि एतय ओहि संकल्पक सेहो विधान लिखल अछि, मुदा ओ प्रत्येक वर्ष करबाक कोनो आवश्यकता नै। तेँ संकल्पमे कोष्ठक भीतर लिखल व वाक्य नहि पढ़ू।

कथा में केला के खंभा सँ मंडप बनलएहि ठाम मंडप अरिपन करबाक विधान कएल गेल अछि। एहि स्थान पर मण्डपक अरिपन दए ओकर भीतर महादेव आ गौरीक आकरितिक अरिपन दए पूजा करबाक सेहएहि ठाम मण्डप पर अरिपन देबाक आ ओकर भीतर महादेव आ गौरीक आकृतिक अरिपन देकऽ पूजा करबाक प्रचलन अछि।

एहिना कुश लए विधिपूर्वक प्रप्राणप्रतिष्ठाक विधि सेहो आब पचलनमे नै अछि। मुदा जँ माटिक मूर्ति बनाए जाइत अछि तँ प्राण प्रतिष्ठा कएल जाइत अछि तँ प्राण-प्रतिष्ठाक विधान होइत अछि।

प्रातःकाल स्नान कए ताम्बाअर्घ्यपात्रमे तिल, कुश आ जल लऽ कऽ संकल्प करू।

नमः भगवन् सूर्य्य भगवत्यो ददेवता (अद्यादि चतुर्दशवर्षाणि यावत् प्रति) भाद्रपद शुक्ल तृतीया तिथि हरिताअहं लीव्रतम् आचरिष्यामि

ई संकल्प करू।

एकर बाद पूरा दिन उपवास करथि।

आँगनमे मंडप सजा कए ओहिमे मेहराब, पताका आदि लगाबी। चन्दन आदि सुगन्धित वस्तुसँ माटि पर नीपि ली। ओतय चारि भुजावाली गौरीक माटिटिक प्रतिमा आ बसहा वरद पर चढ़ाउ।़ल महादेवक प्रतिमा बनाए स्थस्थापित करी। (जँ माटिक प्रतिमा संभव नहिं तऽ एहि रूपमे फोटो राखि सकैत छी।प्रतिदिन जेना गौरीक पूजा करैत छीएहि तरहेँ करब।

तकर बाद कुश, तिल आ जल लऽ कऽ संकल्प करू।

नमः अस्यां रात्रौ भाद्रमासीय-शुक्लपक्षीय—तृतीया तिथौ —गोत्रस्य ——देव्याः मम दीर्घायुष्ट्व-पुत्र-पौत्र आदि दीर्घायुष्मता-जन्मजन्मार्जित-सकल-पापक्षयपूर्वकश्रीगौरीप्रई इच्छामे (अद्यादि चतुर्दशवर्षाणि यावत् ) सकलभाद्रशुक्लतृतीयायां हरमया इतालिव्रतम् करिष्ये।

कुश सहित हाथ सँ शिवक प्रतिमा स्पर्श कए- नमो शिवोऽसि।

गौरीक प्रतिमा छुएर- नमो गौरि असि।

तकर बाद कुश हाथें दूनू मूर्तिकिक सभ अंगक स्पर्श करी-

आँ ह्रीँ क्रौँ यं रं लं वंशं षं सं हं सः अनयोः सर्वेन्द्रयाणि। आँ ह्रीँ क्रौँ यं रं लं वंशं षं सं हं सः अनयोः वाङ्मनश्चकश्रुः श्रोत्रघ्राण इहागत्य सुखं दीर्घं तिष्ठतु स्वाहा।

एहि प्रकारें प्राण-प्रतिष्ठा कए दूनूक षोडश उपचआरसँ पूजा करी।

पहिने महादेवक पूजा करी

एकटा फूल लऽ कऽ महादेवक ध्यान कर।ी।

नित्यं ध्यानं कुर्वन् महेशं रजतगिरक्तवर्णं सुन्दरचन्द्रशिरोरत्नयुक्तं रतिशृङ्गधरं प्रसन्नं स्मरेत्।वरभीतिहस्तं प्रसन्नम्।

कमलपद्मपरिस्थितं सर्वतः स्तुतंरङ्गैः व्याघ्रच्छालया भूषितम्ं विश्वोत्कृष्टं विश्ववन्द्यं सर्वभयहरं पञ्चमुखं त्रिनेत्रम्।

आसन- हाथमे फूल लए अर्पित करी।

स्वागत- हाथ जोड़ि प्रणाम करी।

पाद्य- जल लए अर्पित करी।

अर्घ्य- अर्घीमे दही, दूबी, कुशक अगिला भाग, फूल, अक्षत, कुंकुम (रोली), सरिसो, जल आ सुपारी लए अरघा सँ चढाबी।

आचमनीय- अरघीसँ जल दिय।मधुपर्क- कांसाक थालीमे दही, घिअ, मधु, पानी आ चीनी मिलाकऽ अर्पण करू।आचमन- अरघीसँ जल दी।

स्नानक लेल पानी दिअ।

वस्त्र- विभवानुसार धोती, चादर आदि चढ़ाबी।

आभूषण-सुगन्ध- उजरा आ लाल चानन चढ़ाबी।

फूल चढ़ाबी।

धूप-दीप- जल लए दीप उत्सर्ग करी।

नैवेद्यनैवेद्य मे फूल आ पान राखि जल लए उत्सर्ग करी।

वन्दना: हाथ जोड़ि प्रार्थना करी।तकर बाद फेर फूल लए गौरीक ध्यानध्यान करी-

भास्वज्जपाप्रसूनाभां शश्वत् सुस्थिरयौवनाम्।शंखचक्रगदापद्मवनमालाविभूषिताम्।सिंहोपरि समासीनां भास्करारुणमंशुकम्।दधानां पुरतः संस्थैर्देवदैत्यादिसंस्तुताम्।

घड़ामे पानी लऽ-

नमः शिवायै शिवरूपायै मङ्गलआयै महेश्वरि।शिवे सर्वार्थदे देवि शिवरूपपे नमोस्तु ते।एतानि पाद्यार्घाचमनीयस्नानीयपुनराचमनीयानि नमो गौर्य्यै नमः।

फूल लऽ-

नमः शिवरूपे नमस्तुभ्यं शिवआयै सततं नमः।नमस्ते शिवरूपिण्यै जगद्धातत्र्यै नमो नमः। एतानि पुष्पाणि नमो गौर्य्यै नमः।

दूबि लएएतानि दूर्वादलानि नमो गौर्यै नमः।

बेलपत्रएतानि बिल्वपत्राणि नमो गौर्यै नमः।

लाल रंगक साड़ी- ई संतरे रंगक रक्तवस्त्रम् नमः गौर्ये।

सिन्दूर- एतत् सिन्दूरम् गौर्ये नमः नमः।

चूड़ी, गहना आदि- एतत् आभूषणम् नमो गौर्य्यऐ नमः।

अर्घामे दल लए धूप, दीप, पान- सुपारी आ विभिन्न प्रकारक नैवेद्य अर्पण करी।वेद्यक अर्पण करी-

एतानि सुगन्धपुष्पधूपदीपताम्बूलनाना विधि नैवेद्यानि नमो गगौर्ये नमः। आचमन- एतत् आचमनीयम् नमो गौर्य्यै नमः।

आँजुरमे फूल लए- एषा पुष्पाञ्जलिः नमो गौर्य्यै नमः।

एकर बाद प्रार्थना करी-सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे ससर्वार्थसाधके।संसारवृत्तिविच्छेदे सराहमम सिंहवाहिनि।मया ध्यानकमेन पूजितासि महेश्वरि।राज्यं मे देहि सौभाग्यं प्रसन्ना भव पार्व्वति।

एकर बाद ध्यान लगाकऽ कथा सुनू। वा स्वयं पढ़ू।