मिथिलामे पहिने संस्कृत भाषाएहि मे कथा कहबाक आ सुनबाक विधान छल। महिला लोकनि ई कथा कोनो विद्वान् व्यक्तिसँ सेहो सुनि सकैथिकी, अथवा स्वयं पढ़ि सकैत छथि।

आज महिला स्वयं पढ़िलिखि रहल छथि। बहुत एहन भेटत जे संस्कृत जानैत छथि। ई नीक संकेत थीक। हुनकर मुख सँ कथा सुनबामे ककोनो हर्ज नै। हमर लोकनि केँ अपन परम्पराक एकर रक्षा करबाक लेल ई आवश्यक अछि।

मैथिलीमे कथा मन्दारमालाकुलइटालकायै कपालमालाङ्कितशेखराय।दिव्याम्बरिण्यै च दिगम्बरिण्यै नमः शिवायै च नमः शिवाय।

एक दिस बड़हन माला जकाँ गुँथल केश छनि। दोसर दिस मूडीक हड्डीक माला ओ माथ पर धारण केने छथि। एक दिस सुन्दर पटोर पहिरने आ दोसर दिस बिना कपड़ा पहिरने छथि।थि। एहन गौरी केँ प्रणाम आ महादेवव केँ प्रणाम।

कैलासक रमनगर चोटी पर गौरी महदेवसँ पुछलथिन-

हे महादेव, सभक लेल जे धर्म अछिि जकर फल बिना कोनो विशेष प्रयास के भेटि जाइत छै आ जे नुकाओहि धर्मक फल बिना कोनो विशेष प्रयास के भेटि जाइत छै आ जे नुका यदि अहाँ प्रसन्न छी तँ ठीक ठीहमरा कहू। अहाँ त संसारक स्वामी छी आ अहाँ जन्म, स्थिति आ विनाश सँ ऊपर छी से कोन दान वा कोन तपस्यासँ हमरया अहाँ स्वामीक रूपमे भेटलहुँँ।

महादेव कहलनि-

हे प्रिये हम अहाँ केँ ओ उत्तहम व्रत सुनबै छी। ई हमर नीक व्रत छी, जेकरा सावधानीसँ छुपाकऽ राखबाक चाही, तें हम सभ किछु कहैत छी। जैसन तारा सभक बीच चन्द्रमा तहिना वर्णसभमे ब्राह्मण होइत छथि, ग्रहसभमे सूर्य छथि, वर्णसभमे ब्राह्मण होइत छथि, देवता सभमे विष्णु छथि, नदीसभमे गंगा छथि, प्राचीन ग्रन्थसभमे महाभारत अछि, वेदसभमे सामवेद अछि आ इन्द्सभ रिय मे मन अछि, तहिना पाबनि मे। सभमे ई पाबनि अछि। जइसँ आगम ग्रन्थसभमे कहल गेल अछिएहि पुराणक कथा वेदक ममुख वस्तु थीक। प्राचीन कालमे जे कथा कहल गेलल अछि, तकर अहाँ श्रद्धासँ सुनू।

भाद्रपद मासक शुक्लपक्षमे तृतीयाया तिथि केँ यदि हस्त नक्षत्र यदि भाद्रपद मासक शुक्लपक्षक तृतीया तिथि हस्त नक्षत्रमे पड़ैत अछि तऽ ओहि दिन पाबनि करबासँ सभ पाप मिटि जाइत अछि। सभ पाप मिटि जाइत अछि।

हे देवी, अहाँ त बिना बुझने ई व्रत कयने रही। हम ओ सभटा सुनबैत छी जेना हिमहम ओहि भवन पर देखने रही।

पार्वती कहलनि-

हे महादेव, हम पूर्वकालमे ई उत्तम व्रत हम पूर्वकालमे ई उत्तम व्रत केना कएलहुँ से सभटा अहाँक हम अहाँक मुख सँ सुनय चाहैत छी।

महादेव कहए लगलाह-

हे देवी, पहाड़ सभ मे उत्तम हिमालय अछिलय अछि जे विभिन्न प्रकारक गाछ-वृक्षसँ रमनगर लगैए। ओ बहुते रास चोटी सभ सँ शोभित अछि।छि। एहि पहाड़ पर गंधर्व सभ संग दवेता, सिद्ध, चारण, यक्ष आ गीत गबैत गंधर्व सभ बउहाँ सभ नृत्य करैत रहैत छथि। स्फटिक आ सुन जकाँ चमकय बला चोटी सभ जासँ सजल अछि ओ त्रिकूट जेकाँ आकासँ सजल ओ त्रिकूट जेकाँ अकाशमे बरफक ढेर जेकाँ शोभित अछिबर्फसँ भरल रमनगर चोटी पर जतए गंगानदीक धार खसि पड़ला सँ सुननजर लगैत छल। ओतय अप्सरा सभक झुंडक झुंड नाच सँ जे हिमालय सुन्दर लगै छओहि ठाम अहाँ जहिया बच्चा रओहि दिन हम बड़का तपस्या कयने रही। अहाँ एक हजार वर्ष मूडी लटकाए केवल धुँआ पीबैत रहलहुँ, तकर बाद एक लाख वर्ष धरि पकल पत्ता खाइत रहलहुँ, तकर बाद तँ ओहओहो छोड़ि देलहुँ। अहाँक ई कष्ट देखि अहाँक पिताओ चिन्तासँ दुःखी भेलाह। ओ चिन्तित भऽ गेलाह जे ई कन्या किनका देल जाए। ओ ई बात सोचि रहल छलाह जे मुनि नआर्द ओतय पहुँचलाह। अहाँक पिता हिमालय अर्घ्य आदिसँ हुनकर पूजा कए पुछलथिन।

हिमालय पुछलथिन-

हे श्रेष्ठ मुनि, आइ कोन कारणेअहाँ आइ किएक आयलहुँ से कहू।

नारद बजलाह-

हे देव, जइसँ हमरा आदेश देल गेल अछि, हम विष्णु द्वारा पठाओल गेल छी। छी। योग्य कन्या योग्य व्यक्ति के देबाक चाही। एखन ब्रह्मा, विष्णु आ महेश आदि देवता लोकनिमे वासुदेवक बराबरीक केओ नएहि लेल अहाँ चिन्ता नै करू, ई कन्यारत्न हमरा दऽ दिअ, समय अनुकूल होयत।

हिमालय बजलाह-

यदि कन्या वसुदेव समान देवता होइता माँगैत छथि आ अहाँक आगमन सेहओ महत्त्व रखैत अछि तँ हमरा कन्या दे देबाक चाही।

ई सुनि कए नारद झट दए भगवान् वविष्णु लग पहुँचलाह। ओतय शंख, चक्र आ गदा धारण कएने भगवान् विष्णु लग जाए कल जोडि नारद मुनि कहलनि- हे देव, बड़का काज भऽ गेल आब विवाहक तैमित्रता करू। हिमालय जे कहलनि से सभ कहि देलनि।हम सुनबैत छी- ई कन्या हम गरुडध्वज विष्णु के देलहुँ।नारदक ई गप्प सुनि पार्वती दुओ दुःखसँ व्याकुल भऽ गेलीह। ओकरा दुःखसँ व्याकुल देखिकए रातिमे सखी पुछलनि।

सखी पुछलनि-

हे देवी पार्वती, अहाँ दुःखी कजे अहाँ छी, से ठीक-ठीक कहू। कल्याणकारी उपायसँ हम अहाँक कल्याणक काज करब। एहि में संदेह नहि करू।पार्वती कहलनि- हम जे सोचने रही ओकर उल्टा हमर पिता देलनि। तखन आब हम ई निश्चय ई देह त्यादऽ देब।

पार्वतीक ई गप्प सुनिते सखी बजली।ईह। सखी कहलनि-

अहाँक पिता के जे घोर जओतय के पता नै छनि, त‘ ओतय चलि जाउ। एहि प्रकारें हुनका मना कए तओ घनघोर जंगल दिस चलि गेलाह।एहि दिस पिता हिमालय हुनका घर-ओ घर पर हुनकर खोज करऽ लगलाह। हमर बेटी के के लऽ गेल। की देवता, की दानव वा राक्षस लए गेलऽ गेल। हम जे पहिने प्रतिज्ञा केने हम पहिने प्रतिज्ञा केने छलहुँ हे गौरी, आब हम विष्णु केँ की देब? हे गौरी, एहि चिन्तासँ ओ मूर्छित भए धरती पर खसि पड़लाह। लोक सभ ’हा हा' क' हुनकर दिस दौड़लाह- अहाँ केँ किएक बेहोश भऽ गेलहुँ ठीक सँ कहू।

हिमालय बजलाह-

के दुष्ट हमर दुलारू बेटी केँ किएक लए गेल? की कालसर्प ओकरा डँसि लेलक? की ओकरा सिंह वा बाघ मारि देलक?लऽ गेल? हमर बेटी कतय चलि गेल, हम नहि जानि? वा के दुष्ट ओकरा हरि लऽ गेल?ऐतय तँ अहाँ ओ घरघोर डराओनिहार छी?एतय तँ अहाँ डेराओन ओ घरघोर जंगलमे पहुँचि गेल रही, जतय सिंह, बाघ, साँप, ओहि ठाम गिद्ध, कुकुर आ हिरण सभ भरल छल।ओतहि एकटा रमनगर नदी देखिते ओकर कछार मे अहाँ महादेवक व्रहम त' ओहि में मग्न रहलहुँ आ अहाँक संग सखी सभ बैसल रहथि।अहाँ बालूसँ सतीक संग हमर मूरति बनाएलने रहय आ भाद्र शुकल तृतीया केँ हस्त नक्षत्रक संयोग भेलापर गीत-नाद आ बाजाक संग राति मे जागरणकयने रही। एहि व्रतक प्रभावसँ हमर आसन डोलि गेल। हे देवी, हम ओतहि पहुँचि गेलहुँ जतए अहाँ, सखी सभक संग रहलहुँ। हम कहलहुँ- हम अहाँ सँ प्रसन्न छी, वर माँगू। अहाँ कहलहुँ- हे देव, यदि अहाँ प्रसन्न छी तँ हमर पति महादेव होथि। एहिना होएत- ई कहि हम कैलास पर्वत पर आबि गेलहुँ।तखन भोर भेला पर सभ किछु छोड़ि कए वनमे देखल गाछ-वृक्ष द्वारा जे अहाँ केँ देगेल सैह पारणा केलहुँ। संगहि अहाँ ओतए अपन सखी संसंगहि अहाँ ओतए अपन सखी सं तखन हिमालय सेहो घना जंगल छल। ओहि स्थान पर पहुँचि गेलाह। चारू दिस देखलनि तँ बिना खेने-पीने नदी कातमे दू टा कन्याकओ सभकेँ सुतल देखलनि। ओ हुनका उठेबाक बाद गोदीमे लऽ कऽ हुनकर हाथ पकड़ि लेलनि आ पुछलनि जबाघ, सिंह, हाथी आदि सँ भरल एहि जंगलएहि जंगल में अहाँ किएक एलहुँ?

पार्वती कहलथिन-

हे पिताजी, हमरा पता चलल जे अहाँ हमरा विश्रीकृष्ण केँ द' रहल छी, जे अहाँ हमर सोचने बातसँ भिन्बात नै कएने रही तें हम वन आबि गेलहुँ देलहुँ। तेँ अहाँ हमरा महादेव केँ दए सकैत छी, अनका नहिं।एहिना होएत ई कहि कए हिमालय अहाँ केँ घर लऽ अएलनि। तकर बाद अहाँक पिता द्वारा हमर विवाहक तैयारी आरम्भ भेल। ओहि व्रतक प्रभावसँ अहाँकेँ ई सौभाग्य भेटल। एहि दिनक बादसँ ई व्रत ककरहु केओ नहि बुझि सकल।

एहि व्रतराजक नाम किए पड़ल से सुनू- अहाँ सखी सभक द्वारा एहि दिन हरण कएल गेलहुँ तें एकरा हरितएहि दिन सखी सभ द्वारा हरण कएल गेलहुँ, तें एकरा हरित

पार्वती पुछलथिन- हे देव, नाम तँ कहलहुँ आब हमरा सोझाँहमरा व्रतक विधान सेहो कहू। एहि सँ कोन पुण्य होइत अछि, फल की छै, आ कोन विधान सँ ई पाबनि कएल जाइत अछि।एहि ठाम।

महादेव कहलनि- हे देवि, सुनू, हम कहैत छी। महिलासभक लेल ई उत्तम व्रत थीक। यदि सौभाग्य चाहैत छी तँ ई करबाक विशेष रूपसँ करबाक चाही। केराक थामसँ तोरण आदि बनएबाचाहिए। एहि घरक भूमिकें चन्दन आदि सँसुगन्धित वस्तु सँ मलि दिअ। शंख, ढोल, मृदंग आ आन-आनो बाजा सभसँ अनेक प्रकारक हम एहि घरमे मंगल ध्वनि करबचाहियै। ओतय पार्वतीक संग हमर स्थापनापूजा करबाक चाही। ओहि दिन व्रत कए फूल आदि सँ पूकयल जाय आ राति में जागरणकरा। नारिकेल, संतोला आदि विभिन्न फल, जे ओहि समय आ ओहि स्थान पर फुलैत अछि,तखन ओहि सभसँ आ नव-नव फूलसँ, धूप, दीप, चाँदी सँ एहि मन्त्र सँ पूजा क'री।

शिवायै शिवरूपायै मङ्गलायै महेश्वरि। सर्वार्थदायिनी शिवरूपे देवि शिवे नमोऽस्तु ते।पे नमोस्तु ते।

शिवरूपेण तव नमोऽस्तु शिवे सततं नमः।नमस्ते शिवरूपिण्यै जगद्धातत्र्यै नमो नमः।

संसारवृत्तिविच्छेदे रक्ष सिंहवाहिनि मां। मयाद्य येन कामेन पूजितासि महेश्वरि।।58।।

राज्यं मे देहि सौभाग्यं प्रसन्ना भव पार्वति।हे महेश्वरि, शिवक शक्ति शिवा केँ प्रणाम। शिवस्वरूपा देवी केँ प्रणाम। मंगला केँ प्रणाम। हे शिवा, हे सर्वसिद्धप्रदायिनी, अहाँ जे शिवक स्वरूपा देवी छीी, तनिका प्रणाम। हे शिवस्वरूप देवी, अहाँकेँ प्रणाम। शिवस्वरूपिणी देवी केँ सदा प्रणाम। शिवस्वरूप देवी केँ प्रणाम। संसारक पालन करएवाली देवी जगधात्री केँ प्रणाम। हे सिंहवाहिनी देवी, अहाँ संसारक चक्र केँ काटि मक्षमा दैत छियैक, अहाँ हमर रक्षा करू। जाहि कामनासँ हम अहाँक पूजा जे हम कएलहुँ, से हमरा होअय। हमरा राज्य देउ। हमरा सौभाग्य दियऽ। हमरा पर प्रसन्न होउ।

एकर बाद ब्राह्मणकेँ कपड़ा, गाय आ सोना दान करबाक चाही। पति संग बैसि, कथा सुनिकय चानन फूल आदि लऽ ददानक संकल्प करू।

हे महादेवी, जे महिला लोकनि ई श्रेष्ठ व्रतत विधानपूर्वक करैत छथि हुनका भाग-ओहि महिलाकेँ सौभाग्य आ राज्य प्राप्त होइत अछि। हुनकर पापक नाश होइत अछि।तृतीया तिथि केँ जे लोभसँ भोजन करैत छथि ओ सात जन्म बाँझ होइत छथि फेर-फेर विधवा भ' जाइत छथि। हुनका दरिद्रता, पुत्रक शोक सँ घेरल रहैत छथि। ओ कठोर होइत छथि आ अनेक प्रकाररक दुःख भोगैत छथि। जे व्रत कए ई पावनि नै करैत छथिओ घोर नरक मे जाइत छथि।जे ई व्रत करैत छथि से हजारो अश्वमेध यज्ञ आ सैकड़ो वाजपेय यज्ञक फल कथें टा सुनलासँ ओही ककालमे पाबि जाइत छथि।

संस्कृतमाँ

कथा-मण्डप-मालया अलंकृता तालिकायाः कपालमालाङ्कितशेखराय।दिव्याम्बरधारिण्यै च दिगम्बरधारीण्यै नमः शिवायै च नमः शिवाय।कैलासशिखरे रम्ये गौरी पृच्छति शंकरम्।गुह्याद् गुह्यतरं गुह्यं कस्थिरं कुरु महेश्वर।1।

सभ धर्मक सर्वस्व मानियासेन यत्फलम्।प्रसन्नोऽसि जगन्नाथ सत्यं ब्रूहि ममाग्रतः।

ककरो चासी सँ हमरा प्राप्त दानसँ तपस्यासहित वा।अनादिमध्यनिधनो भर्त्ता त्वम्ं जगत्प्रभुः।

ईश्वर उवाच।श्रवण करू, हम अहाँक समक्ष कहब व्रतम् उत्तमम्।मम एतत् सर्वं गोपनीयं कथयिष्यामि ते प्रिये।।4।।

यथा चोडुगणे चन्द्रो ग्रहाणसूर्य इव च।वर्णानां च यथा विप्रो देवान्ां विष्णुरुत्तमः।

नदीनामपि यथा पुरातनगङ्गाच भारतम्।वेदानां यथा साम इन्द्रियज्ञानानां यथा मनः।

प्राचीन वेदसर्वस्वम् आगमनानुसार यथाउक्तम्।श्रद्धया त्वं श्रुणु एतत् यत्थावृत्तं पुरा व्रतम्।

भाद्रपद मासक श्वेत पक्षक तृतीयाया हस्तसंयुता। तदा केवलं तद् आचरणेन सर्वपापैः पापविनाशेनविमुक्तः भवति।।8।

देव, त्वया पर्वमजानन्त श्रवणं कुरु।या कृता व्रता।तत् सर्वं कथयिष्यामि यथा दृश्यते।ष्टं हिमाचले।

पर्वता उवाच।पूर्वं मया व्रतानि कथं कृतानिं उत्तमं व्रतम्।तत् सर्वं श्रवितुम् इच्छामि त्वत्वत्स काशान्महेश्वर।10।

ईश्वर उवाच।अछि देवी महादैव्य हिमवान् नग उत्तमः। नानावृक्षवरै रम्यो नानाशृङ्गादिचित्रितः।।11।।

जतय देव सगन्धरवा सिद्धचरणगुह्यकाः।यथाहृष्टं गन्धर्वा विचरन्ति।गायक-उत्सुकाः।12।

स्फटिकैः सुवर्णशिखरैःमाणिक्यैवदूर्यैर्भूषितैः।त्रिशिखैरिव हिमवाणे आकाशे शोभते।व राजते।।13।।

हिमानी रम्यशृङ्गाग्रे गंगागपात विचित्रितः।यः अप्सरोनृत्यसंघैः शोभतेो नगेश्वरः।तत्र त्वं पार्वती बाला कुर्वन्ती सुमहत्तपः।

अब्दान् सहस्रं वै धूमपानम्धूमपान।लाक्षाब्दं पकवपर्णाशा त्यकचिन्तपर्णा ततः परम्।तत् दुःखं चिन् दृष्ट्वाओहि सँ ओ दुःखी भेल।कस्मै देया मया कन्या इति चिन्ओ तापस भऽ गेल।एवं चिन्तामग्नस्य मुनिकनारद आययौ।

अर्घ्यादिभिः तं पूजयित्वा हहिमालय बोलल। हिमालय कहल।किमर्थमागतः त्वम् कथ्यताम् मुनिश्रेष्ठ।

नारद उवाच।देव, यथाज्ञां मम विष्णुं श्रुणु।ा प्रेषिता वयम्।योग्यं योग्याय दातव्यं कन्यारत्नमिदं त्वया।वासुदेवसमः नास्ति ब्रह्मवविष्णुशिवदिषु।चिन्ता न कार्या कन्येयं दीयतां मम साम्प्रतम्।

हिमवान् उवाच वासुदेवसमः देवः कन्या यदि याचितुम् इच्छति।तदा मया प्रदातव्या त्वदागमन गौरवात्।तत् श्रुत्वा स शीघ्रं गतवान् नारदः केशवं प्रति।समीपं गत्वा मुनिदेवम् शंखचक्रगदाधरम्।।22।।

मुनिगणकेँ हस्तजोड़ि नमस्कार कयद्रोऽपि अभ्यभाषत।देव सिद्धं महत्कार्यं वैवाहिकपरो भव।23।

हिमवान् उवाच तत् यत् तत्सरवचः श्रूयताम्।एषा कन्या मया दत्ता देवेस्मिन् गरुडध्वजे।।"24।

तखन मुनिक वचन सुनि पपर्वती दुःखी भेल।दुःखभावातिसन्तप्तां सखी पपरात्रि ओकरा पुछलक।25।

सखी, अहाँ दुःखी छी। कियैक सत्य कहू, पारवति।भद्रयासेन भद्रं ते करिष्यएतस्मिन् न संशयः।

पर्वती कहलनि।हम जे करबाक लेल धात्रा तत्कृतमन्यथा।तस्मात् देहत्यागं करिष्यामि।यत्र न संशयः।।28।।

पार्वती तद् वचनं श्रुत्वातखन सखी वचन कहलनि।सखीक वचन पिता जानैत अछि जतय त्वम् तद् वनम् गच्छ।एवं सहमति कय गत्वाशीघ्रं महद्वनम्।पितरः हिमाचलम् अवलोक्य गगृहे गृहे।

केन नीता च मे पुत्री देवदानवराक्षसैः।पूर्वं मया कृतं सत्यं किं दातस्य गरुडध्वजे।

एवं चिन्ता स गौरि मूर्छितछित्त्वा पृथिव्यां पतितः।हा हा कृत्वा ततो लोका अभ्यधातस्मै प्रत्यागच्छति।31।

अचेत भऽ गेलहुँ अहाँ सँ क?तत् विशेषतः कथय

हिमालयवक्ता दुष्टे चेष्टं मे कन्यारत्नं हृतं मम।

दष्टा वा कालसर्पेण सिंहव्यवा बाघेन हता। न जाने क्व गता पुत्री केन दुदष्टेन वा हृता।33।

शोकसन्तप्तः वातेन इव गच्छति जकाँ वृक्ष।त्वम् गतवानसि घोरं निर्जनं वनम् भयवर्धनम्।

सिंह-व्याघ्र-सर्प-भुजङ्गेन क्रोधितटृश्वानमृगाकुलम्।तस्मिन् घोरे वने तूर्णं सखीभीः सह संस्थिता।

तत्र रमणीय नदी देखित्वा तस्यास्तीरे सुमध्यमा।उपविष्टैः सह मनघा हरदृढव्रतम्।

बालुकासँ बनल मूर्ति शिवया सहितस्य मे।भाद्रपद शुक्ल तृतीयायां हस्तनक्षत्रसंयुजि।

ओतय वाद्यसहित गीत रात्रिमे जरात्रि जागरण कएल गेल।यत् प्रातःकाले आसनं चलितम्ं मम।।38।।

प्राप्तो देवि तत्त्रैव जतय त्वं सखिसभक संग।प्रसन्नोऽस्मि मया उक्तम् वरं ब्रूहि वरानने।39।

यदि देव प्रसन्नोसि भर्त्ता मोर पर हर होअय।तथा उक्त्वा अहं देवि कैलआशं नगमागतः।

तखन भोर भेल तखन सर्वथा वर्जितम्।पारणं च कृत्वा तत्र यत् दत्तं वनगोचरैः।

ओतय तूं सेहो सुति रहल छह सखीया अर्धं वरानने।हिमवानपि तं देशमाजगाम महावने।४२।

चारू दिसि पानभू देखिकयजनवर्जितम्।तत्र नदीतीरे प्रस दृष्ट्वाुप्तं कन्यकाद्वयम्।

उठायो उत्साहपूर्वक स्वागत करू।न चकार सः।सिंहव्याघ्रगजैः युक्तं किमर्थं वनमागता।44।

पार्वती उवाच शृणु तात मम ज्त्वम् ज्ञानं ददासि ईश्वरप्रति।तदन्यथा कृत्वा येन तेन अहं वनम्आगता।45।

तैं मां त्वं शिवायैव दातुमरत्वं नान्यथा हसि।तथा उक्त्वा हिमवता त्वम्नीता गृहं प्रति।46।

ततः प्रयुक्ता ते पित्रा मम ववैवाहिक क्रिया।तस्य व्रतस्य प्रभावेण सौभाग्यजे अहाँ प्राप्त कयने छी।

तदादिव्रतरान्तु कस्यापि न प्रकाशितम्।व्रतराजस्य नाम्ना एतत् श्रुणु देवि यथाभवत्।।48।।

जकर हरण सभद्वारा कएल गेल अछि, तेँ ओत्वं हरितालिका।पार्वतीक वचन जे अहाँ कहलहुँएहि व्रतक विधि हमर समक्ष कहू।कियक पुण्य, किय फल च अस्य केन च क्रियते क्रिया।ईश्वर उवाचशृणु देवि विधिं वक्ष्ये नारीणां व्रतमुत्तमम्।।50।।

कर्तव्यं च विशेषेण यदि सौभाग्यामिच्छति।तोरणादि च कर्त्तव्यं कदलीसस्तम्भमण्डितम्।

चन्दनादि सुगन्धैः लेपयेद् गृहपरिसरम्।शंखभेरीमृदङ्गैश्च वादितम्।रैर्बहुभिर्वरैः।

ननामङ्गलचतुर्थ्यां कर्तव्यम्। हमर घरमे।स्थापना तत्र कर्तव्यं पार्वत्या सहितस्य मे।।53।।

उपवास कयि कुर पुष्पैः पूजेत्रात्रौ यज्ञजागरणं।नारिकेलैश्च जम्बीरैः फलैश्चच विविधैस्तथा।54।

ऋतुदेशोत्पन्नैः सर्वैः नैवेदयैः कुसुमैर्नवैः।धूपदीपगन्धैश्च मन्त्रेएतत् सर्वं नानैव पूजयेत्।55।

शिवायै शिवरूपायै मङ्गलायै महेश्वरि। सर्वार्थदायिनी शिवरूपे देवि शिवे नमोऽस्तु ते।पे नमोस्तु ते।

शिवरूपेण तव नमोऽस्तु शिवे सततं नमः।नमस्ते शिवरूपिण्यै जगद्धातत्र्यै नमो नमः।

संसारवृत्तिविच्छेदे रक्ष सिंहवाहिनि मां। मयाद्य येन कामेन पूजितासि महेश्वरि।।58।।

राज्यं मे देहि सौभाग्यं प्रहे पार्वती, संन्यासी भ' जाउ।ब्राह्मणाय दातव्यं वस्तुब्रह्मांडरूपं सुवर्णम्।

कथा श्रुत्वा एकचित्तेन दम्पतिभ्यः सहैव तु।ततः संकल्प्य कुर्वीत गण्धपुष्पादिभिस्तथा।

जे महादेवी व्रत करैत छथिराजा विधिपूर्वक। सौभाग्यं राज्यमायुश्च पापक्षयं प्राप्नुवन्ति।।61।।

तृतीयायां तु या नारी लोभात्भोजनमाचरेत्।सा सप्तजन्म बन्ध्या विधवा पुनरपि पुनरपि।दारिद्र्यं पुत्रशोकश्च कर्कति दुःखभागिनी।याति सा नरकं घोरमुपोष्य न करोति या।।63।।

अश्वमेधसहस्रं च वाजपेयशतानइति च।कथाश्रवणमात्रेणमात्रेण तत्कालः लभते नरः।।64।।

एतत् ते कथितं देवि तवाग्रे तु वरानने।अहं स्वागमे अर्पणविधिं कथयिष्यामि।एवं यथोदितम्।।65।।

गोभू-हिरण्यदान आदि वस्त्रदाननपुरःसरः।तथा यागाः प्रकर्तव्यः सर्वकामार्थसिद्धये।।66।।

कथा समाप्त भेल।