सामा चकेवा – मिथिलाक अनुपम पाबनि
पद्मपुराणमे कथा एहि प्रकार अछि जे -भगवान् श्रीकृष्ण केँ जाम्बवती स्त्रएहि मे साम्ब नामक पुत्र आ सामा नामक कन्या छल। छलथिन्हि- जनिक विवाह चारुवक्त्र सँ भेल छलन्हि। सामा केँ वृन्दावन सँ विशेष स्नेह छलन्हि।ते ओ गुप्त रूप सँ नित्य वृन्दावनमे आबि रहैत छलीह।बि सप्तर्षि लोकनिक स्थान मे कथा-पुराण सुनि फेर अपन घर जाइ छली।
ई बात चुड़क नामक एक शूद्र श्रीकृष्णक ओतय चुगली कऽ देलक जे “महाराज, अपन कन्या (सामा) प्रतिदिन राति वृन्दावन जाइ छथि”।
ई कथा सुनिकय भगवान कृष्ण सामा केँ श्राप देलनिएहि ठाम जे- “तूँ हमर आज्ञा बिना वृन्दावन जतें पक्षी रूप भऽ वृन्दावन मे वारह।”
एहि प्रकार कृष्णक शाप (शाप) सँ सामा चकावाकी (चकबी) ओ पक्षी रूप धारण कऽ वृन्दावन मे बसि गेली। हुनकर स्वामी (चारुवक्त्र) बहुत दुखी भऽ कऽ तपस्या सँ महादेव के प्रसतखन ओ मंगल वर माँगलनि जे— ”हे शंकर, हमर परम प्रिया स्त्री कृष्णक शाप सँ पक्षी बनि गेल छथि, तै हमहुँ पक्षी बनि जाउ।”पक्षी रूप भऽ गेल छथि, तें हमरो पक्षी रूप देल जाय।"पंख बना देल जाय जाहि सँ हम अपन स्त्रीक संग वृन्दावन में सुखभोग करी।"संग वृन्दावन में सुखभोग करी।" महादेव प्रसन्न भऽ हुनका चक्रवाक (चकवा) पक्षीक रूप दऽ कऽ हुनका वृन्दावन पठा देलथिन्हि।
एतय साम्ब अपन प्रिय बहिन ओ बहिनोयक ई समाचार सुनिकय हुनकर उद्धारक लेल भगवानकृष्णक आराधना करऽ लगलाह। किछु दिनमे साम्बक सेवा देखि कृषण कहलनि जे “अहाँ की चाहै छी?’
एहि पर सुन साम्ब कहलनि- ”पिताजी, अहाँक शापसँ हमर बहिन पक्षीक रूपमे भेगएली। जाहिसँ हम अत्यन्त दुखी छी, तें कृपा कय हमर बहिन आ ओकरा पर लागल शाप सँ मुक्त करू।मुक्त भऽ अपन पूर्व स्वरूपमे आबि जाय।”
साम्बक ई कथा सुनिकय कृष्ण कहलनि जे हम एक चुगलबाजक बात सुनि सामा केँ श्राप देलहुँ, वास्तव में ओकर अपराध तहन नहि छल।
अब शाप सँ छुटकारा पाबय के उपाय ई अछि जे कार्तिक कार्तिक मास हमर परम प्रिय अछि। तैं कार्तिक कृष्णपक्षक पडिबा में खड़क वृन्दावन ओ सप्तर्षिक तथा सामा, चकबा ओ अँहिक माटिक मूर्ति बनाए नित्एहि पूजा मे तथा एक चुगिला (चूड़क) क मूर्ति बनाकऽ ओकर मुख झरकाय स्त्रिगण राति में गामक बहार खेत-खेत घुमाय खेलि करथि तथा कार्तिकी पूरपूर्णिमा केँ विसर्जन कऽ अपन-अपन भाइ केँ मिष्टान्न (दही, चूड़ा, चीनी आदि) भोजन करबैत छथि तँ सामा शापसँ मुक्त भऽ पूदेववत् रूपमे सुख भोगि सकैत अछि। भगवान कृष्णक ई कथा सुनिकय साम्ब अपन दएहि प्रकारेँ समस्त नारीसभसँ कार्तिसामा चकबाक खेल करौलन्हि जाहिसँ सामा दूनू व्यक्ति शाप सँ मुक्त भ” पूररूप पाबि भाइ केँ आशीर्वाद दै कहलन्हि। " अहॉक आज्ञा सँ जे कोनो चुगिलाक मुँह डाहि, सप्तऋषि सभ हमर पूजा कएलनि आ प्रति कआरतिक में जे काज करैत अछि, ओ अहाँ जेकाँ भाइ तथा सओहाग ओ सन्तान सँ भरल पूरल रहत।
सामाक ई कथा सुनबाक चाही।

