देव उत्थान एकादशी

पहिल

नवम्बर २०२५

शनिदिन / शनिदिन

देवोत्थान एकादशी पर शनिबार, नवम्बर ०१, २०२५
देवोत्थान एकादशी पूजा मुहूर्त – सायंकाले
अवधि – अहोरात्र
एकादशी तिथि आरंभ – सुबहक ०९:१० बजे पर नवम्बर ०१, २०२५
एकादशी तिथि समाप्त – सुबहक 07:30 बजे पर ०२ नवम्बर २०२५

देव उठौना एकादशी, देवोत्थान एकादशी, हरिबोधिनी एकादशी, प्रबोधिनी एकादशी – मिथिलाक एकटा महत्वपूर्ण पर्व

मिथिलाक गाम-गाम में घर-घर-घरमे कार्तिक शुक्ल एकादशी के देवोत्थानन एकादशी श्रद्धा सँ मनाओल जाइत अछि।

आषाढ़ शुक्ल एकादशीकेँ भागवान माता लकक्षीरसागरमेँ षष्मीजी संग शयन करैत छथित छैथि, भाद्रपद शुक्ल एकादशीकेँ करौट फेरै छैथि आ आजुक दिन अर्थात कार्तिक शुक्ल एकादशीकेँ निद्रा त्याग करै छैथि। ई तीनू एकादशी क्रमशः हरिशयनी, पार्श्व परिवर्तिनी (कर्माधर्मा) आ देवोत्थान नाम सँ जानल जाइत अछि।

शयन दिन (हरिशयनी एकादशी) सँ जागरण दिन (देव उठौना एकादशी) एहि चारि मास केँ चतुर्मास कहल जाइत अछि। एहि अवधिमेँ शुभ संस्कार जेना विवाह इआदि शुभ संस्कार वर्जित रहैत अछि।

मिथिला में परम्परा अनुसार ई पूजा साँझ कएल जाइत अछि। आँगन में तुलसीक गाछ लग होइत अछि। एतय अष्टदल अरिपन संग घरक सभ उपयोगी वस्तुपुस्तक जेकाँ उपयोगी वस्तु सभक अरिपन देल जाइत अछि, कड़ाही, संदूक, खोर, चमचा, चौकी, छत्ता, बेंत, हँसु, खुरपी, हर-हरवाह उखड़ि, ढेकी आदि।
आँगनक बीचमे पिठारसँ रंगल अष्टदल अरिपन सँ गोसाउनिक सिर धरि भगवान – भगवतीक घर दिस अबैत पैरक छापक अरिपनहि देल जाइत अछि।
कनिया-बहुरिया सखीबहिनपा संग एक दोसरक आँगनक अरिपन देखैतओहो चलि जाइत छथि। एहि अरिपनक सामा-चकेबा विदाई दिन अर्थ पूर्णिमा साँझसँ मिटा देल जाइत अछि। मान्यता अछि जे सामा एहि अरिपन के नइ देखथि।

भगवानक पूजा

जतय ओहिठाम शालिग्राम भगवान नहि छथिओ व्यक्ति श्री सत्यनारायण भगवानकओहिठाम शालीग्राम भगवान नहि रहै छथिहि ओ व्यक्ति श्री सत्यनारायण भगवानक अष्टदल अरिपन पर पीढ़ी राखि कलशस्थापन कऽ पूजा करैत छथिन। अष्टदल अरिपन पर पीढ़ी राखि कलश स्थापना कयल जाइत अछि। गन्नाक खंडा आ नव खरनी सँ मंदिर बनाओल जाइत अछिकयल जाइत अछि, कलश पर चौमुखी दीप आ पीढ़ीक चारू कोन पर ओहि पर सेहो दीप प्रज्वलित कायल जाइत अछि। गंध, पुष्प, धूप, दीप, पान, तुलसी मंजर, चानन, सामयिक फल, अन्य नैवेद्य (एहिमे अन्नक व्यवहार एकदम वर्जित अछि) एहि सभसँ यथोचित पूजा-विधि कएल जाइत अछि।।
तखन कम सँ कम चारि गोटे जे व्रत कएने होओ निम्नलिखित मन्त्र पढ़ैत तीन बेर ओहि पीढ़ी सहित भगवान केँ उठाबैत छथि।
एहिमे प्रथम दू मन्त्र बैसि कए आ अन्तिमन्त्र पढ़बाक समय उठबाक परंपरा अछि।।
ब्रह्मेन्द्र-रुद्रैः अभिवन्द्यमानः भवान् ऋषिर्वन्दित-वन्दनीयः।
प्राप्ता तवेयं किल कौमुदाख्या जागृषत्वं जागृहि च लोकनाथ।
मेघा गता निर्मलपूर्णचन्द्रशारद्यपुहस्तौ मनोहरौ।
अहं ददामि च पुण्यहेतुं जागृहिग्रहण कय लोकनाथ।
उठू, उठू गोविन्द, निद्रा त्यागू।हे जगत्पति, उठू, उठू, निद्रा त्यागू।
अहाँ द्वारा उत्थापित त्रि लोकम्।

पूजा सम्पन्न कए गृहस्थ रातिमे भगवानकमें चढ़ाओल गेल फलसँ पारण करैत अछि।