देव उठाओन एकादशी, देवोत्थान एकादशी, हरिबोधिनी एकादशी, प्रबोधिनी एकादशी – मिथिलाक एकटा महत्त्वपूर्ण पाबनि
मिथिलाक गाम-गाम में घरे-घरे कार्तिक शुक्ल एकादशी के देवोत्थान एकादशी श्रद्धा सँ मनाओल जाईत अछि।
आषाढ़ शुक्ल एकादशीकेँ भागवान माता लक्ष्मीजीकेँ संग क्षीरसागरमेँ शयन करैत छैथि, भाद्रपद शुक्ल एकादशीकेँ करौट फेरै छैथि आ आजुक दिन अर्थात कार्तिक शुक्ल एकादशीकेँ निंद्रा त्याग करै छैथि। ई तीनू एकादशी क्रमशः हरिशयनी, पार्श्व परिवर्तिनी(कर्माधर्मा) आ देवोत्थान नाम सँ जानल जाइत अछि।
शयन दिन ( हरिशयनी एकादशी ) सँ जागरण दिन ( देव उठाओन एकादशी ) एहि चारि मास कें चतुर्मास कहल जाइत अछि, अहि अवधिमेँ शुभ संस्कार जेना विवाह इत्यादि वर्जित रहैत अछि।
मिथिलामें परमपरानुसार ई पूजा सांझ कए आँगनमें तुलसी गाछ लग होइत अछि। एतय अष्टदल अरिपन संग घरक सकल उपयोगी वस्तु सभक अरिपन देल जाइत अछि जेना पोथी, खड़ाओ, संदूक, बखारी, सूप, चालनि, छत्ता, बेंत, हाँसू, खुरपी, हर-हरवाह उखड़ि, ढ़ेकी इत्यादि।
आंगनक मध्य पिठार सेनूरसँ देल अष्टदल अरिपन सँ गोसाउनिक सिर धरि भगवान – भगवतीक घरदिस अबैसन पैरक छापकेर अरिपन देल जाइत अछि।
कनिञा-बहुरिया सखी-बहिनपा संग एक दोसरक अंगनाक अरिपन देखैलेल सेहो जाई छथि। अहि अरिपन के सामा-चकेबा विदाई दिन अर्थात पूर्णिमा साँझसँ मिटा देल जाइत अछि। मान्यता अछि जे सामा अहि अरिपन के नइ देखथि।
भगवानक पूजा
जिनका ओहिठाम शालीग्राम भगवान रहै छैन्हि ओ व्यक्ति श्रीसत्यनारायण भगवानकेँ पूजा करैत छथिन। अष्टदल अरिपन पर पीढ़ी राखि कलशस्थापन कायल जाइत अछि। कुसियारक छिप आ नव खड़ सँ मंदिर बनाओल जाइत अछि, कलश पर चौमुखी दीप ओ पीढ़ीक चारु कोन पर सेहो दीप प्रज्वलित कायल जाइत अछि। गंध, पुष्प, धूप, दीप, पान, तुलसी मञ्जरी, चानन, सामायिक फल, अन्य नैवैद्य ( एहिमे अन्नक व्यवहार एकदम वर्जित अछि ) इत्यादिसँ यथोपचार पूजा कायल जाइत अछि।
तखनि कमसँ कम चारि गोटे जे व्रत कएने होथि से निम्नलिखित मन्त्र पढैत तीन बेर ओहि पीढी समेत भगवान् कें उठबैत छथि।
एहिमे प्रथम दू मन्त्र बैसि कए आ अन्तिम मन्त्र पढबाक बेर उठएबाक परम्परा अछि।
ब्रह्मेन्द्र-रुद्रैरभिवन्द्यमानो भवानृषिर्वन्दित-वन्दनीयः।
प्राप्ता तवेयं किल कौमुदाख्या जागृष्व जागृष्व च लोकनाथ।।
मेघा गता निर्मलपूर्णचन्द्रशारद्यपुष्पाणि मनोहराणि।
अहं ददानीति च पुण्यहेतोर्जागृष्व जागृष्व च लोकनाथ।।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते।
त्वया चोत्थीयमानेन उत्थितं भुवनत्रयम्।।
पूजा सम्पन्न कए गृहस्थ रातिमे भगवानकें चढाओल गेल फलसँ पारणा करैत अछि।

